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Love Story :- कुसुम और विवेक का अधूरा प्रेम

 प्रेम की खामोशी 


पहाड़ों के बीच एक छोटा-सा गाँव था  गाँव का नाम बिलासपुर था। वहाँ की संकरी संकरी गलियाँ, मिट्टी से बने कच्चे मकान, छोटे छोटे मोड़ और हर मोड़ पर बसी हुई कहानिया ! उन्हीं में एक कहानी थी विवेक और कुसुम की।

Love-story


विवेक, एक शांत स्वभाव का लड़का था, जो किताबों और पहाड़ों से प्यार करता था। उसका मानना था कि कुछ कहानियाँ शब्दों में नहीं, ख़ामोशियों में बसी होती हैं। वहीं, कुसुम स्वभाव से थोड़ी नदी की लहरों जैसी चंचल थी, जो हर बात को खुलकर कहने में यकीन रखती थी। वो गाँव की सबसे सुंदर लड़की थी, जिसकी हँसी में एक ओनोखा जादू था।


मुलाकात की चाहत 

गर्मियों की एक शाम, जब सूर्य देव पर्वतों के पीछे छिप रहा था, कुसुम अपने खेतों में पानी देने गई थी। वहीं पास में एक बड़ा सा बरगद का पेड़ था, जिसकी छाँव में बैठा विवेक कोई पुरानी किताब पढ़ रहा था। हवा में एक पत्ता उड़ा और जाकर उसकी किताब के बीच अटक गया। विवेक ने जब पत्ता हटाया, तो देखा कि कुसुम उसे एक टक निहार रही थी।


"क्या देख रही हो?" विवेक ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।  

"तुम्हारी किताब को, और तुम्हें भी," कुसुम ने बिना झिझके कहा।


विवेक थोड़ा चौंका, क्योंकि वो लोगों से कम ही बातें करता था। लेकिन कुसुम की बेबाकी ने उसे मोहित कर लिया। दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला बढ़ा और धीरे-धीरे दोस्ती की डोर मज़बूत होती गई।


प्रेम का अहसास 

समय बीतता गया। बारिश के मौसम में जब गाँव की गलियाँ कीचड़ से भर जातीं, तो दोनों खेतों के किनारे खड़े होकर बारिश का मज़ा लेते। कुसुम जब अपनी रंग-बिरंगी चूड़ियाँ विवेक के सामने घुमाती, तो वो मुस्कुराकर कहता, "इन चूड़ियों की खनक में भी एक धुन है।" कुसुम हँसकर कहती, "तो फिर इस धुन पर एक कविता लिखो।"


विवेक ने पहली बार किसी के लिए कुछ लिखा। वो शब्द नहीं, कुसुम के लिए उसके मन में उठने वाली भावनाओं का अक्स थे। कुसुम ने जब वो कविता पढ़ी, तो उसकी आँखों में आँसू थे। वो जान गई थी कि ये सिर्फ़ दोस्ती नहीं, इससे कुछ ज्यादा था।


प्रेम में बिछड़ना   

पर हर प्रेम कहानी आसान नहीं होती। गाँव में एक दिन खबर आई कि कुसुम की शादी तय हो गई है। विवेक को यह सुनते ही जैसे किसी ने अंदर से तोड़ दिया। कुसुम ने भी अपने माता-पिता से बहुत विरोध किया, लेकिन गाँव के रीत-रिवाजों के आगे उसकी एक न चली।


वो दिन भी आ गया जब कुसुम की बारात दरवाजे पर थी। विवेक दूर से देख रहा था। उसने अपनी आँखों में आँसू दबाए, लेकिन कुसुम की आँखों में बाढ़ थी। जाने से पहले उसने विवेक को एक आखिरी बार देखा और वही पुरानी कविता उसके हाथ में थमा दी, जिस पर उसने लिखा था -


"तुम्हारी हँसी की चूड़ियाँ अब भी खनकती हैं,  

पर अब उनकी आवाज़ मुझ तक नहीं आती।"


प्रेम की खामोशी   

कुसुम चली गई, लेकिन विवेककी ज़िंदगी वहीं ठहर गई। उसने लिखना जारी रखा, लेकिन अब उसकी कहानियाँ उदास हो गई थीं। पहाड़ों में उसकी ख़ामोशियाँ अब भी गूंजती थीं, लेकिन अब उन्हें सुनने वाला कोई नहीं था।


बिलासपुर की गलियाँ अब भी वही थीं, लेकिन उनकी कहानियों में अब सिर्फ़ विवेक की तन्हाई थी।


और इस तरह, ये प्रेम कहानी शब्दों से ज्यादा ख़ामोशियों में बसी रही…


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